प्यारे भाई बांधवों,
मेरा आपसे जो नाता बना है,
मै नहीं समझता,
की अब कभी तोरे भी टूटेगा,
लेकिन क्या करें नियति हमें यही सिखलाती है,
मैंने अपनी पढाई की सुरुआत एक मिटटी के स्लेट और पेंसिल से की थी,
गाँव के ही हाई स्कूल से मैंने दसवीं और बारहवीं पास की
और अपने पास के छोटे से शहर मुजफ्फरपुर की ओर
अपने मंजिल की तलाश में चल पड़ा.
यहाँ मैं कुल तीन साल रह कर औद्योगिक रसायन से अंतरस्नातक की परीक्षा पास की,
और चला आया मै चेन्नै जहाँ आज हूँ,
मै शायद ज्यादा ही भावुक हो गया हूँ लेकिन बात भी तो भावुक होने वाली ही है?
मै धन्यवाद देना चाहूँगा अपने उन सारे शिक्षकों को जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया
उन दोस्तों को जिन्होंने मेरे साथ अपने और मेरे दुःख सुख के उन छनो को बिताया,
मै अपने इन दिनों को कभी नहीं भूलूंगा ,
आज का दिन मुझे ख़ुशी और गम दोनों से शराबोर दिख रहा है,
और ये ख़ुशी हंसी और दुःख आंसू बन कर निकल रहा है